Wednesday, October 23, 2013

माननीय श्री राहुल गांधी, कांग्रेस उपाध्यक्ष का चुरू की जनसभा में सम्बोधन - दिनांक : 23-10-2013

नमस्कार, गुरूदास कामत जी, चन्द्रभान जी, अशोक गहलोत जी, शीशराम ओला जी, नरेन्द्र बुढानिया जी, हाजी मकबूल मण्डेलिया जी, मास्टर भंवरलाल मेघवाल जी, भंवरलाल पुजारी जी, हमारे सब यहां कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ता, जो हमारे यहां नेता बैठे हैं, भाईयो और बहनो, आप सबका यहां पर बहुत-बहुत स्वागत। गर्मी में आप यहां आये इसके लिए आपको बहुत-बहुत धन्यवाद।
इससे पहले मध्यप्रदेश में मेरे दो भाषण हुए और मैंने एक भाषण में शायद आपने अखबार में पढ़ा होगा कि मैंने अपनी मां के बारे में एक कहानी बोल दी। सुना आपने? तो मैंने अपनी मां के बारे में एक कहानी बोल दी, अस्पताल के बारे में की वह बीमार थी और आमतौर से शायद ऎसी सभाओं में लोग दिल की बात नहीं करते हैं, भाषण करते हैं, विकास की बात होती है, इलेक्शन की बात होती है मगर दिल की बात नहीं होती। सही बात है या गलत बात है? सही बात है। तो मैंने वहां दिल की बात कर दी और जब मैं दिल्ली पहुंचा तो मेरी मां मुझे कहती है, फोन आया और उन्होंने मुझे कहा कि देखो कि तुम मेरी कहानी क्यों बताते हो, तुम अपनी कहानियां बताओ। जो मेरी कहानी है, वह मेरी कहानी है जो मेरा दर्द है वह मेरा दर्द है और अगर मां ने मुझे कहा कि उनकी कहानी नहीं बोलनी चाहिए और अपनी कहानी बोलनी चाहिए तो मैंने सोचा अपनी कहानी बोल दूं। सही बात है या गलत बात है ?
अभी जब मैं आ रहा था, मैं ऎसे भाषणों में जाता हूं और विकास की बात करता हूं, प्रगति की बात करता हूं, आतंकवाद की बात करता हूं, दंगों की बात करता हूं, भाईचारे की बात करता हूं, मगर जो अंदर की बातें हैं जिसको बोलने का कारण मैंने आपको कभी नहीं बताया। मैंने अपने दिल की बात आपको कभी नहीं बताई और मैंने सोचा जब मां ने कहा कि तुम अपनी कहानी बताओ, मेरी कहानी नहीं बताओ तो मैं अपनी कहानी बता देता हूं। इलेक्शन की मीटिंग है। आम तौर पर ऎसी बातें इस मीटिंग में नहीं होती है। मगर मैं आपका लम्बा टाइम नहीं लूंगा जल्दी से बता दूंगा।
आज अभी जब मैं आया तो बुढ़ानिया जी ने मुझे कहा कि देखो यहां आपसे पहले राजीव गांधी जी आये थे और उन्होंने यहां दौरा किया था। ब्राउन कलर की जीप थी, सोनिया जी आयी और उन्होंने यहां दौरा किया और फिर उन्होंने मुझे एक बात बताई। उन्होंने कहा कि वह 31 अक्टूबर को यहां आई और तब मैं हैरान हो गया। मैंने उनसे पूछा क्या 31 अक्टूबर को आई उन्होंने कहा हां। मैंने पूछा किस साल आये। उन्होंने जवाब दिया कि 1987 में आये और फिर मैं चुप होकर आगे चला और फिर उन्होंने कहा नहीं-नहीं, गलत बात कही मैंने वह 31 अक्टूबर को नहीं आये 31 अगस्त को आये। मैंने उनसे कहा मैं जानता था 31 अक्टूबर को वह यहां नहीं आ सकते थे, क्योंकि 31 अक्टूबर को मेरी दादी की हत्या हुई थी और 31 अक्टूबर को दिल्ली में उनका फंक्शन होता है और दिल्ली में उनको रहना पड़ता है।
मैं आपके सामने यहां खड़ा हूं और मैं भाईचारे की बात करता हूं। मैं कहता हूं कि जो बीजेपी के लोग हैं ये लडाई कराते हैं। एक-दूसरे से लडाई कराते हैं। हिन्दू की मुसलमान से लड़ाई कराते हैं इसके खिलाफ मैं बोलता हूं। मगर मैंने आपको कभी नहीं समझाया क्यों बोलता हूं। अंदर का कारण क्या है, मैं आपको बताने वाला हूं। मैं छोटा सा लड़का था, 14 साल का और मेरे घर का सिस्टम थोड़ा सा आपको बता देता हूं। प्रियंका और मैं छोटे थे और पापा वहां पर कानून बनाते थे। पापा बहुत कड़ा कानून बनाते थे और कहते थे तुम्हे ये-ये करना है। हम दोनों पापा से डरते थे और मेरे लिए कानून को तोड़ने का तरीका जो मेरे लिए प्रोटेक्टिव हुआ करता था, मुझे बचाता था इन कानूनों से वह मेरी दादी थी। जब पापा कुछ करते थे, कुछ कहते थे, तुम्हे यह करना है तो मेरी दादी कहती थी, अच्छा तुम यह कर लो। मैं आपको एक उदाहरण देना चाहता हूं जब मैं खाना खाता था और मुझे पालक अच्छा नहीं लगता था और पापा मेरे सामने पालक रखते थे और जब खाना चल रहा होता था तो दादी अखबार लगा लेती थी और उस अखबार के पीछे मैं पालक उनकी प्लेट में कर देता था। दादी प्रधानमंत्री थी मैं पोता था, मुझे नहीं मालूम था उस समय कि प्रधानमंत्री में क्या शक्ति होती है, क्या नहीं होती है पर घर में बचाती थी। उनका वहां पर एक असिस्टेंट हुआ करता था नत्थूराम। दादी से लोग डरते थे, पर मैं नही डरता था, क्योंकि वह मुझे बचाती थी। जब मैं सुबह उठता था तो मेरे पास नत्थूराम आता था तथा मुझे कहता था कि मुझे एक बात बताओ कि दादी का मूड़ कैसा है ? और फिर मैं उनसे कहता कि मूड़ अच्छा है, या मूड़ खराब है, मतलब ऎसी बातचीत चलती थी। दूसरी तरफ मेरे दो तीन दोस्त थे वो मेरी दादी की देखभाल करते थे। जैसे ये खड़े है यहां पर, ऎसा काम करते थे। एक का नाम सतवन्त सिंह, एक का नाम बेअन्त सिंह, केहरसिंह, बलवीर सिंह और उनको मैं जानता था, अच्छी तरह जानता था। एक ने मुझे बैडमिन्टन खेलना सिखाया, शॉट कैसे मारी जाती है। दूसरे ने मुझे पुलक, जैसे ऊपर खींचते हैं, वह सिखाया और दोस्ती थी। काफी समय की दोस्ती थी और उन पर मुझे भरोसा था एक प्रकार से।
एक दिन सुबह का समय था और मैं घूमने गया। 1984 की बात थी मैं गार्डन में घूमने गया। मैं जल्दी जग जाता था, उस समय ओलम्पिक चल रहे थे। गार्डन में जब मैं घूम रहा था तो वहां पर बेअन्त सिंह जी मुझसे मिले और उन्होंने मुझसे दो-तीन सवाल पूछे। उन्होंने मुझसे पूछा कि तुम्हारी दादी कहां सोती है। मैं छोटा सा था मुझे क्या मालूम ? मुझे लगा ही नहीं कि सवाल ठीक नहीं और मैंने उनको सीधा सा जवाब दे दिया कि वहां सोती है। फिर उन्होंने मुझसे पूछा कि आपको क्या लगता है कि आपकी दादी की सुरक्षा में कोई कमी तो नहीं ? और ऎसी बातचीत हुई और फिर उसने मुझे क्या कहा, उसने मुझे कहा कि देखो अगर तुम्हारे ऊपर कभी भी कोई हथगोला फेंके तो तुम्हें इस प्रकार लेट जाना चाहिए। मुझे बात समझ नहीं आई, मैं 14 साल का लड़का था। मैं भूल गया उस बात को। 10-15 साल भूल गया। मैं वापस गया ओलम्पिक का प्रोग्राम था, दादी वहां बैठी थी मैंने उनसे बातचीत की। सालों बाद मुझे पता लगा कि दादी की हत्या से पहले सतवन्त सिंह, बेअन्त सिंह और बाकी जो लोग थे, वह दादी के ऊपर दीपावली के समय हथगोला फेंकना चाहते थे। बात समझ में आई। दादी के ऊपर दीपावली के समय हथगोला फेंकना चाहते थे। और जानते हो उसके बाद क्या हुआ? दादी की हत्या की। यहां जो हमारे सिक्ख भाई बैठे हैं, उनको कहानी मालूम है, उसके बाद क्या हुआ? कहानी पूरी मालूम है। मेरा क्या हुआ? सबसे पहले मेरी दादी चली गयी और उस दिन की बात मैं आपको बताना चाहता हूं। उस दिन क्या हुआ ? सुबह मैं उठा और स्कूल गया और स्कूल में मैं ज्योग्राफी की क्लास में बैठा था, पढ़ रहा था। नीचे वहां पर एक पेट्रोल पम्प हुआ करता था। मैं जब छोटा था तो मुझे पढ़ाई-वढ़ाई अच्छी नहीं लगती थी। अब यहां काफी लोग होंगे जिनको पढ़ाई अच्छी नहीं लगती होगी। मुझे भी अच्छी नहीं लगती थी, मैं बाहर देख रहा था। उस समय एक व्यक्ति अंदर आया और उसने टीचर से बात की। फिर टीचर मेरे पास आई और उसने कहा कि तुम्हें घर जाना है। मुझे उस दिन कुछ समझ में नहीं आया, मैंने सोचा कुछ होगा। मैं प्रिंसिपल के ऑफिस में गया। मैंने फोन उठाया तो हमारे घर में एक महिला काम करती है, वह चिल्लाई। मतलब ऎसी चीख मैंने पहले कभी नहीं सुनी और मैंने उससे पूछा क्या हुआ? पर वह मुझे जवाब नहीं दे रही थी। मेरे पापा बंगाल में थे, तो मैंने उनसे पूछा कि पापा ठीक है तो उसने जवाब दिया कि हां पापा ठीक है। फिर मैंने पूछा कि मम्मी ठीक है, उसने कहा मम्मी ठीक है। फिर मुझे मालूम था कि पापा ठीक है, मम्मी ठीक है तो दादी हो सकती है। तो मैंने फिर कहा दादी ठीक है और यह सुनते ही उसने कहा नहीं-नहीं, दादी ठीक नहीं है, तुम एकदम आओ और फोन रख दिया।
मैं आपको बताऊं वह दर्द जो मुझे उस दिन हुआ, उसके बाद एक और बार हुआ। जब पापा मरे। मतलब वह जो दर्द था, मैं उसको जानता हूं और मैं उसको समझता हूं। मैं स्कूल के गेट पर गया और मेरा पी एस ओ जो था, मैंने उनसे पूछा कि क्या हुआ? उसने कहा नहीं-नहीं, दादी ठीक है, गोली चली है मगर कुछ नहीं हुआ। मेरे पैर कांप रहे थे और मैंने पूछा मेरी बहन अपने स्कूल में है, तो पी एस ओ ने कहा कि चलो प्रियंका के स्कूल चलते हैं। वह स्कूल गये, प्रियंका को मालूम नहीं था। प्रियंका को मैंने कहा घर में कुछ हुआ है और फिर हमको गाड़ी में पिछली सीट पर मुझे और प्रियंका को बिठाकर बॉडीगार्ड हमारे इर्द-गिर्द बैठ गये और हम घर गये। जब हम घर गये तो एक तरफ दादी का खून और एक कमरे में मेरे जो दोस्त थे, उनका खून था। काफी सालों के लिये मुझमें काफी गुस्सा था अपने दोस्तों पर। सतवन्त सिंह और बेअन्त सिंह पर बहुत गुस्सा था, मैं उसको लेकर घूमता था। कुछ भी उल्टा-सीधा कह देता था मुझे मालूम ही नहीं होता था और गुस्सा आ जाता था। मुझे 10-15 साल लगे उस बात को समझने के लिये। उस गुस्से को नीचे रखने के लिये मुझे 10-15 साल लगे। मैं आपको बताना चाहता हूं कि मैंने उसको कैसे नीचे रखा। वहां गुस्सा चला गया। लोग गुस्सा हो गये थे और उनको सिर्फ गुस्सा ही दिख रहा था और आज यहां पर हमारे सिक्ख भाई बैठे हैं, इनमें भी गुस्सा खत्म हो गया और गुस्सा खत्म करने के लिये साल लगते हैं, गुस्सा चालू करने में मिनट लगते हैं। मिनट, एक मिनट और गुस्से को खत्म करने के लिये भाईचारा, प्यार, यह करना पड़ता है।
मेरे कमरे में कुछ महीने पहले पंजाब के एक एम. एल. ए. आये थे। वह वहां पर बैठे, बातचीत चल रही थी। जाने से पहले वह कहता है राहुल जी, आज मैं यहां बैठा हू, इस बात को मैं मान नहीं सकता हूं कि मैं आपके कमरे में बैठा हूं। मैंने पूछा कि भाई इस बात को क्यों नहीं मान सकते ? वह मुझे कहता है कि देखो, आप मुझे 20 साल पहले मिलते तो मैं शायद आपको जान से मार डालता। मुझे इतना गुस्सा था कि 20 साल पहले मैं आपको जान से मार डालता और आज मैं आपके साथ यहां बैठा हूं और आपके साथ गले मिल सकता हूं। देखिये, मैं आपसे यह क्यों कह रहा हूं गुस्सा किसी  के अंदर भी आ सकता है, गुस्सा डाला जाता है। राजनेता लोग डालते हैं, इंट्रेस्टेड जो पार्टी होती है, वह डालती है, और फिर जो आम आदमी होता है, जिसको चोट पहुुंचती है, उसको गुस्से को अपने साथ ले जाना पड़ता है। सब जगह गुस्से के साथ घूमता है। इसलिये मैं बीजेपी की राजनीति के खिलाफ हूं। इसलिये कि यह करते क्या हैं? यह राजनीतिक लाभ के लिये चोट पहुंचाते हैं।
मैं अभी मुजफ्फर नगर गया। वहां मुसलमानों से मिला, हिन्दुओं से मिला और मैं आपको बताऊं। उन लोगों में मुझे अपनी कहानी दिखाई दे रही थी। उनके दुःख में मुझे अपना चेहरा दिखाई दे रहा था। इसलिये मैं इनकी राजनीति के खिलाफ हूं और इसलिये मैं चाहता हूं कि हिन्दुस्तान एक साथ रहे, एक साथ लड़े और एक साथ मरे। और यह क्या करते हैं मैं आपको बताऊं, यह क्या करते हैं? मुजफ्फरनगर जायेंगे, आग लगा देंगे, गुजरात में आग लगा देंगे, यूपी में आग लगा देंगे, कश्मीर में आग लगा देंगे और फिर आप लोगों को और हमें आग बुझानी पड़ती है। हमें जाना पड़ता है युवाओं के घर में, हमें उनके हाथ पकड़ने पड़ते हैं, हमें उनको ठंडा करना पड़ता है। इससे देश का फायदा नहीं होता है, इससे देश का नुकसान ही होता है। कितने लोग करते हैं। इससे गुस्सा पैदा होता है। और सुनो, मैंने यह एक बार नहीं कहा है, दो बार, मेरी दादी को मारा, मेरे पापा को मारा और शायद एक दिन मुझे भी मार देंगे। कोई फर्क नहीं पड़ता मुझे। मुझे आपसे दिल की बात करनी थी, मैंने अपने दिल की बात कर दी। लम्बी बात थी।
अब मैं थोड़ा गहलोत जी और राजस्थान की बात करना चाहता हूं। गुस्सा सिर्फ हत्या करने से नहीं आता है। जब आप सड़क पर चल रहे होते हो, कोई आपके ऊपर गाड़ी मार देता है तब भी आपको गुस्सा आता है। जब कोई गांव में भूखा बैठा रहता है, यहां मुझे महिलाएं नहीं दिख रहीं, महिलाएं कहां हैं? हां वह पीछे बैठी हैं। यह जो महिलाएं हैं, जब यह अपने बच्चों को देखती हैं, बाइजी आपका नाम क्या है? नाम क्या है आपका? राजलता जी। जब ऎसी महिलाएं अपने बच्चों को देखती हैं, एक तरफ इनको टी.वी. दिखाई देता है, जहाज पर व्यक्ति चल रहे हैं, बड़ी-बड़ी बोटों पर चल रहे हैं, बड़ी-बड़ी गाड़ियां हैं, एक तरफ उनको वह दिखाई देता है, दूसरी तरफ उनको अपने बच्चे दिखाई देते हैं जो घर में बैठे हैं, पेट भूखा है और यह अपने आपसे पूछते हैं भइया मेरे बच्चे का क्या होगा? उस जहाज पर वह कब चलेगा, उस रेल में वह कब चलेगा? रेल और जहाज छोड़ दो, उसका पेट कब भरेगा? यह सवाल भी महिलाएं पूछती हैं। दूसरी तरफ यहां हमारे युवा हैं, उनके दिल में भी दर्द है। नाम क्या है तुम्हारा? महावीर। महावीर के दिल में भी दर्द है और क्या पूछता है अपने आपसे, यह टी.वी. देखता है , यह कहता है भाई मैं बेरोजगार हूं, और मैं रोजगार चाहता हूं। क्यों? मैं अपनी मां, अपने पिता की देखभाल करना चाहता हूं। यह जो गुस्सा है, यह जो दर्द है, इस दर्द को हम कम करने की कोशिश करते हैं।
हमने आपको रोजगार योजना क्यों दी? हिन्दुस्तान में जो करोड़ों लोग हैं, जिनके पास रोजगार नहीं है, उनको रोजगार मिले। भोजन का अधिकार क्यों दिया हमने? अच्छा सबसे पहले भोजन के अधिकार का मतलब क्या है? मुझे बताओ कितने किलो अनाज मिलता है? परिवार को कितना मिलता है ? 25 किलो मिलता है, वह कितने रूपये किलो में मिलता है? एक रूपया। यह हम क्यों करते हैं बताओ मुझे। जो गरीब व्यक्ति है, जो रोज लड़ाई लड़ता है, उसको मदद करने के लिये, उसके पेट को भरने के लिये।
अब देखो, एक बात मैं सीधी बता देता हूं। कांग्रेस पार्टी पिछले 9 सालों में अधिकार की राजनीति की है, गरीबों की राजनीति की है। और अधिकार की राजनीति हम करेंगे, गरीबों की हम राजनीति करेंगे। जमीन अधिग्रहण बिल की बात की। बिल में हमने पता है क्या डाला। किसान की जमीन जाती है तो किसान को फायदा मिलना चाहिये। मगर हमने वहां यह भी किया कि जो मजदूर किसान के खेत में काम करता है, उसको भी फायदा मिलना चाहिये। अगर कोई छोटा सा खेत वाला है तो उसको भी फायदा मिलना चाहिये। आपको अच्छी तरह समझना है। हम यह नहीं कह रहे कि सिर्फ हिन्दुस्तान में गरीब है, हिन्दुस्तान में गरीब लोग हैं, हिन्दुस्तान में अमीर लोग हैं। पर बिना बिजनैस के, बिना व्यापार के, बिना इंडस्ट्री के यह देश आगे नहीं जा सकता है। हम सिर्फ यह कहते हैं कि पार्टनरशिप होनी चाहिये। गरीब को और अमीर को एक साथ मिलकर हिन्दुस्तान को आगे बढ़ाना है।
बीजेपी सड़कों की बात करती है। हमने इनसे तीन गुना ज्यादा सड़कें  बनाई हैं पांच साल में और सिर्फ सड़कें ही नहीं हमने भोजन भी दिया और हमने सड़कें भी ज्यादा बनाईं। अभी पी सी सी प्रेसीडेन्ट ने कहा हिन्दुस्तान में सबसे ज्यादा राजस्थान में किया। यहां पानी की कमी है और आपको मालूम है कि हमने पानी के लिये इंदिरा गांधी कैनाल का एक्सटेंशन कर दिया और उससे आपको फायदा मिला है। राजस्थान में गहलोत जी ने जबरदस्त काम किये हैं। बिजली का काम किया है, किसानों का काम किया है। यहां बुजुर्ग बैठे हैं आपको मालूम होगा, हां-हां दवाइयों का किया है। आहिस्ता-आहिस्ता आ रहा हूं। दवाई की बात मैं भूला नहीं, तो मुफ्त दवाइयां, पशुओं के लिये भी मुफ्त, हम सबको एक साथ ले जाना चाहते हैं और पशुओं को भी एक साथ ले जाना चाहते हैं। गरीब को, अमीर को, हर जाति के लोगों को, हर धर्म के लोगों को, सबको एक साथ ले जाना चाहते हैं। यह हमारी सोच है। मैंने थोड़ी दिल की बात कही, थोड़ा लम्बा भाषण हो गया।
मैं एक और बात कह देताहूं अब मैंने आपको आज की कहानी बताई। अब यह 2013 के चुनाव की लड़ाई चल रही है, मगर मेरा काम सिर्फ चुनाव जीतने का नहीं, मेरा काम आपको थोड़ा भविष्य के बारे में बताने का भी है।मैं आपको दो चीजें कहना चाहता हूं और जिससे चूरू को फायदा होने वाला है। जो यहां युवा बैठे हैं इनको आने वाले समय में दबाकर रोजगार मिले। यहां जो लड़के बैठे हैं आपको हिन्दुस्तान के लिये पूरी दुनिया में जाना पड़ेगा। आने वाले समय में आप अमरीका जाओ, जापान जाओ, मैं आपको समझाना चाहता हूं हम यहां करने वाले हैं क्या? देखिये दुनिया में ज्यादा से ज्यादा मैन्युफैक्चरिंग चीन में होती है। अमरीका, इंग्लैण्ड, जर्मनी, इटली यह सब चाहते हैं कि मैन्युफैक्चरिंग का काम सिर्फ चीन में न हो। अब हम क्या कर रहे हैं हम पूरे हिन्दुस्तान में रेल्वे लाइन फ्रेट बना रहे हैं एक तरफ और दूसरी तरफ कोरिडोर दिल्ली से लेकर गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र से लेकर तमिलनाडु तक और कलकत्ता से लेकर दिल्ली इन सारी जगह हम डाल रहे हैं। बिजली, पानी, सड़क पूरा ढांचा हम बना रहे हैं। और यहां चूरू भी आ रहा है। मैंने इनको पूछा आपकी सबसे  मुश्किल क्या है। सबसे ज्यादा मुश्किल जमीन की बात उठती है। जहां जमीन अच्छी नहीं है, राजस्थान में रेगिस्तान है, मेरे पास कुछ लोग आये, उनको कहा वहां जाकर आप फैक्टरियां डालिये। राजस्थान से, खास तौर से चूरू में उसका फायदा होने वाला है। यहां के युवा अमरीका, यूरोप और आस्ट्रेलिया जाकर हिन्दुस्तान का चेहरा है, नाम रोशन करेंगे इस देश का। पर इस काम को करने के लिये पार्टनरशिप की जरूरत है। गरीब की पार्टनरशिप, उद्योगपति की पार्टनरशिप, किसानों की पार्टनरशिप, मजदूर की पार्टनरशिप, पूरे हिन्दुस्तानियों की पार्टनरशिप, अशोक गहलोत और राजस्थान सरकार की पार्टनरशिप सबको जोड़कर यह काम करना है।
अंत में एक बात कहना चाहता हूं आने वाले 10 सालों में एक बार और कहना चाहता हूं राजनीतिक सिस्टम में हम बदलाव चाहते हैं। इस देश में सबसे बड़ा काम कौनसा है, मैं आपको बता देता हूं । इस देश में सबसे बड़ा काम यह है कि हमने राजनीतिक सोच को, चाहे वह बीजेपी हो, चाहे वह कांग्रेस हो, बी एस पी हो, समाजवादी पार्टी हो, इस ढांचे को 300-400-500 लोग चलाते हैं। आने वाले समय में मैं चाहता हूं कि इस ढांचे को सब लोग चलायें। जैसे राजीव गांधीजी ने कम्युनिकेशन का किया। आज आपके हाथों में मोबाइल फोन हैं। कोई भी अधिकार हो, मैं ऎसे काम करना चाहता हूं। 2014 का समय है तो अभी तो ब्रेक लगेगा, 2014 में राजनीतिक बदलाव पार्टियों में आने वाला है और जिस दिन कांग्रेस पार्टी ने कर दिया, उनको भी करना पड़ेगा। आप सबका बहुत बहुत धन्यवाद। नमस्कार। जयहिन्द।
- - -

No comments:

Post a Comment